अलौकिक बनारस और पवित्र गंगा के घाट

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वाराणसी कहे या बनारस या फिर काशी !

धार्मिक रंगो में डूबा यह भारत का सबसे पुराना शहर भगवान् शिव की नगरी कहलाता है। ऐसा माना जाता है कि यह भव्य शहर भगवान शिव के “त्रिशूल” पर खड़ा है। काशी को प्राचीन भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है ।

अनगिनत घाट , दो प्रसिद्ध विश्व विद्यालय काशी हिन्दू विश्व विद्यालय और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्व विद्यालय यही काशी में स्थित हैं | यहाँ 85000 के करीब मंदिर है। यह नगरी मलमल और रेशमी कपड़ों, इत्रों, हाथी दांत और शिल्प कला के लिये व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र रही है।

गंगा नदी के तट पर स्थित यह उन सबसे आश्चर्यजनक स्थानों में से एक है जहाँ जितनी बार यात्रा कर लो , आपका मन कभी नहीं भरेगा ।

किसी ने खूब कहा है “इतिहास से भी पुराना, परंपरा से पुराना, किंवदंती से भी पुराना और इन सभी को मिलाकर देखने से भी दोगुना पुराना शहर है काशी !

वाराणसी में घाटों से जुड़ी कई पौराणिक कहानियां हैं, जिनमें से प्रत्येक एक के रूप में दिलचस्प और चौंकाने वाली है।
भले ही यह शहर भीड़ भाड़ वाला है पर महिमा विभिन्न धर्मग्रन्थों में गायी गयी है। परन्तु फिर भी जो शांति जो सुकून काशी की धरती पर है वह और कही नहीं ।

चलिए जानते है ऐसा क्या खास है इस शहर मे !

दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती
काशी विश्वनाथ मंदिर के नजदीक स्थित यह घाट बनारस के सबसे महत्वपूर्ण घाटों मे से एक है । यदि आप घाटों पर पुजारियों द्वारा हर शाम की जाने वाली गंगा आरती नहीं देखते हैं तो वाराणसी यात्रा अधूरी मानी जाती है। काशी में गंगा में लगायी गयी डुबकी मोक्ष के द्वार खोल देती है। वाराणसी में गंगा आरती देखने के लिए बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी आते हैं। तभी तो कहते है मुक्ति चाहिए तो काशी आईए !

गंगा आरती 45 मिनट तक चलती है।
शुरुआती समय: शाम 6:45 बजे

मणिकर्णिका घाट
मणिकर्णिका घाट दिवंगत लोगों के लिए मोक्ष (आध्यात्मिक पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति) तक पहुंचने के लिए सबसे शुभ स्थानों में से एक है। इस घाट की विशेषता है कि यहां चिता की आग कभी शांत नहीं होती है। इस घाट पर अंतिम संस्कार की चिता 24/7 जलती है, और हर दिन लगभग 200 दाह संस्कार होते हैं। बताया जाता है कि मणिकर्णिका घाट को भगवान शिव ने अनंत शांति का वरदान दिया है। ऐसा माना जाता है कि जीवन कि सच्चाई मणिकर्णिका घाट पर है। मान्यता यह है कि भगवान शंकरजी द्वारा माता सती के पार्थिव शरीर का अग्नि संस्कार मणिकर्णिका घाट पर किया गया था। इसीलिए इसे महाशमशान कहा जाता है।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान् शिव को समर्पित 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों मे से एक है। पवित्र गंगा नदी के पश्चिम तट पर स्थित यह मंदिर वाराणसी की गरिमा को और ज्यादा बढ़ा देता है। बहुत से लोग इसे भगवान शिव का स्वर्ण मंदिर कहते हैं क्योंकि मंदिर के दो गुंबद सोने से ढके हुए हैं । लोगों का मानना है कि जब पृथ्वी की स्थापना हुई थी, तब सूर्य की पहली किरण काशी पर सबसे पहले गिरी थी। मंदिर प्रतिदिन लगभग सुबह 2:30 बजे खुलता है। मंदिर में प्रतिदिन 5 आरती होती है।

वाराणसी की नदियां
इस शहर का विस्तार गंगा नदी के दो संगमों एक वरुणा नदी से और दूसरा असी नदी से संगम के बीच बताया जाता है। इन संगमों के बीच की दूरी लगभग ढाई मील है। इसी दूरी की परिक्रमा हिन्दुओं में पवित्र पंचकोसी परिक्रमा कहलाती है।

पंचकोसी परिक्रमा
पंचकोसी यात्रा पवित्र काशी मंडल के आसपास तीर्थयात्रियों द्वारा की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण यात्राओं में से एक है। यह पवित्र यात्रा अतुलनीय मणिकर्णिका घाट पर गंगा नदी में डुबकी लगाने के साथ शुरू होती है। कर्दमेश्वर, शिवपुर, रामेश्वर, भीमचंडी और कपिलधारा वे पांच स्थान हैं जहाँ पर भक्तों को अपनी पंच कोशी परिक्रमा पूरी करनी होती है।

वाराणसी कहे या बनारस या फिर काशी !

गंगा नदी में नाव की सवारी
बनारस जाकर गंगा नदी मे नाव की सवारी का आनंद आपकी यात्रा को और मजेदार बना देगा। नाव मे बैठ कर सभी घाटों का दृश्य आपका मन मोह लेगा। आप अपनी नाव मनमंदिर घाट से बुक कर सकते हैं। अगर यह यात्रा आप सुबह के समय करते है तो इस से बेहतरीन वक़्त और कोई भी नहीं हो सकता। इस पवित्र शहर मे सुबह – सुबह घाटों पर साधुओं के भजन,पक्षियों की चहचहाहट, सुबह की प्रार्थना, उगते हुए सूरज की लालिमा जो इस नगरी को और भी भव्य बना देती है।

सारनाथ
बनारस से १० किलोमीटर दूर स्थित यह प्राचीन शहर सारनाथ में बुद्ध के पहले उपदेश का घर है। सारनाथ वह जगह है जहां बौद्ध धर्म अस्तित्व में आया है। सारनाथ का मुख्य आकर्षण चौखंडी स्तूप है जिसे अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद बनवाया था। अगर आप कभी काशी आएं तो सारनाथ जाना ना भूलें।

चौखंडी स्तूप

बनारस सिल्क
भारत दुनिया भर के 200 से अधिक देशों में अपने रेशम का निर्यात करता है और विशेष रूप से यूरोप और अमेरिका में इसकी मांग बढ़ रही है। बनारसी सिल्क और साड़ियों का उत्पादन विशेष तकनीकों और अद्वितीय रचना का उपयोग करते हुए, विशेष रूप से प्राचीन शहर वाराणसी और आसपास के गांवों में किया जाता है। छावनी रोड पर स्थित, बनारस सिल्क एम्पोरियम पारम्परिक रेशम का बहुत बड़ा निर्याता है।

अगर आप सम्पूर्ण परम्परागत भारत देखना चाहते है तो मेरा सुझाव है की आप एक बार काशी जरूर आएं।

Shivani Sharma

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